चैत्र नवरात्र में मनसा देवी मंदिर में उमड़ा श्रद्धालुओं का रेला

हरिद्वार। शक्ति की आराधना के दिन चैत्र नवरात्र शुरू हो गए हैं। नवरात्रों में 9 दिनों तक मां भगवती की आराधना की जाती है। धर्मनगरी हरिद्वार में यूं तो माता के कई मंदिर हैं लेकिन यहां शिवालिक पर्वत पर स्थित मनसा देवी मंदिर से लाखों भक्तों की आस्था जुड़ी हुई है।
नवरात्र के दिनों में मनसा देवी मंदिर में दर्शन के लिए भक्तों की लंबी कतार लगती है। मंदिर को रंग बिरंगी लाइटें और फूलों से सजाया जाता है। सुबह और शाम के वक्त भव्य आरती की जाती है। मंदिर की स्थापना के पीछे एक पौराणिक इतिहास है।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार प्राचीन काल में महिसासुर नाम के राक्षस ने देवताओं और मनुष्यों पर अत्याचार कर रहा था। जब महिसासुर के अत्याचारों से त्रस्त हो गए तब देवताओं ने त्रिदेव ब्रह्मा, विष्णु, महेश से दैत्य महिषासुर के अत्याचारों से मुक्ति दिलाने की गुहार लगाई। त्रिदेवों के आह्वान पर मां मनसा देवी का अवतरण हुआ। जिसके बाद मनसा देवी ने राक्षस महिषासुर का संहार किया। पृथ्वी लोक को दैत्य के अत्याचारों से मुक्ति दिलाई। ऋषि मुनियों और देवताओं की मनसा पूरी होने पर ये अवतार महिषासुर मर्दिनी भी कहलाया।
मनसा देवी मंदिर में साल भर श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है। धर्मनगरी हरिद्वार पहुंचने वाले बहुत से श्रद्धालु मनसा देवी मंदिर में भी दर्शन के लिए जाते हैं। नवरात्र के दिनों में यहां नजारा बेहद खास हो जाता है। नवरात्र के दिनों में मंदिर माता के जयकारों से गूंज उठता है। मंदिर में दूर-दूर से आए श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ जाती है।
शिवालिक पर्वत पर स्थित मनसा देवी मंदिर का दृश्य इतना मनमोहक है कि यहां जो भी एक बार आता है वो दोबारा यहां आने की मनसा जरूर रखता है। श्रद्धालुओं का अनुभव है कि यहां आने से उनकी कई मनोकामनाएं भी पूरी हुई हैं। मनसा देवी मंदिर पर मनोकामना के लिए धागा भी बांधा जाता है। जब उनकी मनोकामना पूर्ण हो जाती है, तब फिर से उस धागे को खोलने आना पड़ता है।
हरिद्वार हिंदुओं की आस्था का केंद्र है। हरिद्वार में साल भर गंगा स्नान के लिए लाखों की संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। नवरात्र के पावन दिनों में हरिद्वार की मनसा देवी और चंडी देवी मंदिर भी माता के जयकारों से गूंजाएमान है। वैसे तो साल भर इस मंदिर में भक्तों की भारी भीड़ जमा रहती है लेकिन नवरात्र के दिनों में मंदिर की छठा अलग ही देखने को मिलती है। करीब तीन किलोमीटर की पैदल चढ़ाई करके शिवालिक पर्वत की चोटी पर मंदिर पहुंचा जाता है। इसके अलावा मंदिर जाने के लिए उड़न खटोला भी संचालित होता है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *