पहाड़ों पर पड़े सूखे से काश्तकार व बागवान हुए परेशान

देहरादून। बारिश और बर्फबारी न होने से सेब उत्पादकों की चिंताएं बढ़ गई हैं। कश्तकारों को अब बीते वर्ष की भांति इस वर्ष भी सेब की फसल के नुकसान होने का डर सता रहा है। बीते वर्ष भी समय पर बारिश और बर्फबारी नहीं हुई थी, जिससे स्योरी फल पट्टी सहित धारी कफनौल क्षेत्र में महज तीस प्रतिशत सेब की फसल का उत्पादन हो पाया था। काश्तकारों को इस वर्ष अच्छी फसल की उम्मीद थी, लेकिन मौसम ने उनके अरमानों पर फिर से पानी फेर दिया है।
रंवाई घाटी के नौगांव, पुरोला और मोरी ब्लॉक में पच्चीस हजार मीट्रिक टन से भी अधिक सेब का उत्पादन होता है, जिससे सैकड़ों परिवारों की आजीविका जुड़ी हुई है। सेब की अच्छी पैदावार के लिए शीतकालीन अवधि में चिलिंग आवश्यकता का पूरा होना जरूरी होता है। चिलिंग का मतलब सेब, चेरी और अन्य फलों के पेड़ों को वसंत में ठीक से खिलने और फलने-फूलने के लिए सर्दियों में एक निश्चित अवधि तक ठंडे तापमान (आमतौर पर 0 से सात डिग्री या 32 से 45 फारेनहाइट के बीच) की आवश्यकता होती है।
दूसरे शब्दों में कहे तो सामान्यतया सात डिग्री सेल्सियस से कम तापमान पर 1200 से 1600 घंटे की चिलिंग आवश्यकता होती है, जो 15 दिसंबर से 15 फरवरी के मध्य पूरी होती है। जनवरी का आध से ज्यादा महीना बीत चुका है, अभी तक बारिश और बर्फ नहीं गिरी है। सेब के पौधों की आवश्यक शीत मान घंटों की पूर्ति न होने से पौधों की शारीरिक प्रक्रियाएं प्रभावित हो रही हैं, जिसका उत्पादन और गुणवत्ता पर असर पड़ना तय है। वहीं, रवाईं घाटी में बीते तीन महीनों से बारिश नहीं होने के कारण मटर की फसल पूरी तरह बर्बाद हो गई है।
क्षेत्र के काश्तकारों का कहना है कि समय पर बारिश न होने से मटर की फसल में न तो उचित बढ़वार हो पाई और न ही फलन हुआ, जिससे किसानों को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है। मटर काश्तकार कवींद्र असवाल, रमेश असवाल और नवीन गैरोला ने बताया कि सिंचाई के सीमित साधनों के चलते सूखे खेतों में फसल बचाना संभव नहीं हो पाया और पूरी मेहनत बेकार चली गई। जिला पंचायत सदस्य विजय बंधानी का कहना है कि सूखे जैसी स्थिति से काश्तकारों की मटर, गेहूं और सरसों की फसल भी खराब होने की कगार पर पहुंच गई है। दो माह पहले बोई गई गेहूं और मटर की फसल पूरी तरह से अंकुरित नहीं हो पाई है। असिंचित भूमि पर काश्तकार बुवाई तक नहीं कर पाया है।
वरिष्ठ वैज्ञानिक उद्यानिकी भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद डॉ पंकज नौटियाल सामान्य परिस्थितियों में जब रबी मौसम के शीत मान तापमान की आवश्यकता पूरी हो जाती है, तब पौधे समान रूप से सुप्तावस्था से बाहर आ जाते हैं और उनकी शारीरिक क्रियाएं संतुलित रहती हैं। जिससे अच्छे उत्पादन की संभावना रहती है। यदि इसी तरह मौषम का मिजाज रहा तो उत्पादन पर प्रभाव पड़ सकता है, मिट्टी में पर्याप्त नमी बनी रहे काश्तकारों को हल्की सिंचाई करनी चाहिए।

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